📖 कविता
“कोई कहती—दुश्मन ने यहाँ पंगा लिये,
कोई बुलाती—त्योहार रंग-बिरंगा लिये।
किसकी गोद में मैं सोऊँ? दोनों रोती हैं माँ—
कोई आँचल लिये, कोई तिरंगा लिये।”
“मेरी महबूबा पहले तो डर जाएगी,
धीरे-धीरे वो फिर भी सँवर जाएगी।
घर में बैठी जो माँ कर रही इंतज़ार,
कहीं सुनके खबर ऐसी—मर जाएगी।”
“मैंने सोचा था अब तो सजन बन गया,
मेरी किस्मत ही—मेरा वतन बन गया।
जो दुपट्टा दिलाया मैंने कानपुर में,
वो दुपट्टा अब मेरा कफ़न बन गया।”
“पहले रोएगी—आफ़त में जान हो गया,
फिर संभालेगी—बेटा महान हो गया।
माँ कहेगी कि मेरा बेटा बुझदिल नहीं,
वो तो माँ भारती पे कुर्बान हो गया।”
“कभी अलविदा न कहना गले हार हो गया,
एक सरहद पे ऐसा चमत्कार हो गया।
माँ और महबूबा ने इतनी कर दी दुआ—
ठीक होकर… वो फिर से तैयार हो गया।”
✍️ कवि रंजन शर्मा (पक्का बिहारी)
📚 Description
आंचल और तिरंगा कवि रंजन शर्मा (पक्का बिहारी) की एक मार्मिक वीर रस कविता है। इस रचना में एक सैनिक के जीवन, उसकी माँ, उसकी महबूबा और मातृभूमि के प्रति समर्पण को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। कविता प्रेम, त्याग, बलिदान और देशभक्ति का अद्भुत संगम है, जो हर पाठक के हृदय को भावुक कर देता है।
✍️ रचनाकार: कवि रंजन शर्मा (पक्का बिहारी)
📍 शहर: संग्रामपुर, मुंगेर
🏛️ राज्य: बिहार
Published on: Event.MirchiPlus
Keywords: आंचल और तिरंगा, कवि रंजन शर्मा, पक्का बिहारी, वीर रस कविता, देशभक्ति कविता, सैनिक कविता, हिंदी कविता, Event.MirchiPlus
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