बारिश और एक वक्त की रोटी | अनुष्का सिंह 'राधा' | हिंदी कविता | Event.MirchiPlus
📖 बारिश और एक वक्त की रोटी
✍️ अनुष्का सिंह 'राधा'
Lucknow University
कुछ लोग लेते हैं लुत्फ़
काँच की दीवारों से गिरते हुए पानी का,
परंतु कुछ चूते हुए छप्पर से
दुःख व्यक्त करते हैं।
सामान समेटे हुए
और घर के छोटे से कोने में,
सिमट कर बैठ जाते हैं।
सोचते हैं कि बारिश बंद हो
और वह घर से निकले।
काँच वाले घरों में बनती हैं पकौड़ियाँ,
और छप्पर वाले घरों में एक वक्त का खाना बन जाए, यही बहुत है।हाँ, कहीं ईंट और गारे से बने घरों में भी
आराम मिलता है,
पर कहीं-कहीं से चूती रहती हैं बूँदें,
फिर भी एक वक्त का खाना नसीब हो जाता है।
पर छप्पर वाले घरों में
एक वक्त के खाने के लिए महीनों लोग तरस जाते हैं।
गीली लकड़ियाँ और ऊपर से भीगा चूल्हा,
बड़ी मुश्किल से बनती है एक वक्त की रोटी।
हाँ, बारिश सबके लिए एक जैसी नहीं होती।
मुश्किल से कुछ लोग बारिश में खा पाते हैं एक वक्त की रोटी।
📝 रचना परिचय
"बारिश और एक वक्त की रोटी" युवा रचनाकार अनुष्का सिंह 'राधा' की एक संवेदनशील सामाजिक कविता है। यह रचना बताती है कि एक ही बारिश अलग-अलग लोगों के जीवन में अलग अर्थ रखती है। किसी के लिए बारिश आनंद और पकौड़ों का मौसम है, तो किसी के लिए भीगे चूल्हे, टपकते छप्पर और एक वक्त की रोटी की चिंता। यह कविता सामाजिक असमानता, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है तथा पाठकों को समाज की वास्तविकताओं पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
© Copyright
यह रचना अनुष्का सिंह 'राधा' की मौलिक साहित्यिक कृति है। लेखक की पूर्व अनुमति के बिना इस रचना का पूर्ण अथवा आंशिक पुनर्प्रकाशन, संशोधन या व्यावसायिक उपयोग वर्जित है।
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