बारिश और तुम्हारा याद आना | दिशांत गुप्ता | हिंदी प्रेम कविता
आज इस मूसलाधार बारिश में भीगते हुए जब मैं घर लौटा, तो मुझे तुम याद आईं। यह दरकती शाम जब बादलों को इकट्ठा करके एक योजना बनाती है, मुझे उस वक्त तुम बहुत याद आती हो। वो भीगे होंठ, भीगा बदन और मेरी सूखी आँखें सिर्फ एक रास्ता ढूँढती नज़र आईं, और वो रास्ता सिर्फ प्रेम का था। यहाँ तक कि मैं इस शाम को जी पाने में भी सक्षम नहीं रहा; परंतु मैं इस बारिश को देखकर गुनगुनाना नहीं भूला। गाने के हर लफ़्ज़ में तुम थीं, हर राग में तुम थीं, बारिश की हर बूँद में भी तुम ही थीं। मेरे भीगे बदन पर तुम थीं, मेरे भीगे होंठों पर तुम थीं, मेरे भीगे कपड़ों की खुशबू में तुम थीं, मेरे हृदय के बाएँ छोर में भी तुम ही थीं। और इस बारिश को रोकने के लाख प्रयत्न देख, मैं तुम्हारे दर से लौट चलने पर मजबूर हुआ। अंततः, मैंने त्याग दिया हमारा वो अभिन्न प्रेम, जो पनप रहा था तुम्हारी और मेरी खूबसूरत यादों में, हमारी बातों में।
दिशांत गुप्ता
लखनऊ विश्वविद्यालय
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