बहुत दिन हो गए आँखों में वो मंज़र नहीं आते! ग़ज़ल | डॉ. अशोक पाण्डेय 'गुलशन' | हिंदी ग़ज़ल | Event.MirchiPlus

 बहुत दिन हो गए आँखों में वो मंज़र नहीं आते

बहुत दिन हो गए आडॉ. अशोक पाण्डेय 'गुलशन' | हिंदी ग़ज़ल | Event.MirchiPlus





📖 ग़ज़ल

✍️ डॉ. अशोक पाण्डेय 'गुलशन'

बहुत दिन हो गए आँखों में वो मंज़र नहीं आते,
तुम्हारी याद के चेहरे हमारे घर नहीं आते।

समय के साथ मिलकर काम करना बुद्धिमानी है,
हमेशा ज़िन्दगी में एक से अवसर नहीं आते।

तुम्हारे प्यार के ख़त को लगा दी है नज़र किसने,
बहुत दिन से कबूतर अब हमारे घर नहीं आते।

हुए हमदर्द दुश्मन भी जुदाई में ज़रा देखो,
तुम्हारे बाद छत पर अब कभी पत्थर नहीं आते।

बहुत है दूर मंज़िल, चल रहे हैं हम अकेले ही,
सदाएँ सुनके भी नज़दीक अब रहबर नहीं आते।

न जाने क्या ख़ता कर दी है हमने प्यार में 'गुलशन',
जिन्हें यह ज़िन्दगी सौंपी वही दिलवर नहीं आते।

📝 रचना परिचय

यह ग़ज़ल डॉ. अशोक पाण्डेय 'गुलशन' की संवेदनशील और विचारोत्तेजक रचना है। इसमें प्रेम, विरह, समय, जीवन की सच्चाइयों और बदलते रिश्तों की गहरी अनुभूति व्यक्त की गई है। हर शेर अपने भीतर एक अलग भाव और जीवन का अनुभव समेटे हुए है, जो पाठक के मन को छू जाता है।

✍️ रचनाकार : डॉ. अशोक पाण्डेय 'गुलशन'
📍 पता : उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच
🏙️ राज्य : उत्तर प्रदेश

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