📖 कविता
🎙️ कवि मुंह नहीं खोलेगा, तो फिर खोलेगा कौन?
सच हम नहीं बोलेंगे, तो फिर बोलेगा कौन?
✍️ कलम मेरी बिकाऊ हो जाए, ऐसा मेरा ज़मीर नहीं।
कोई पैसों से ख़रीद ले हमें, ऐसा कोई अमीर नहीं।
काला चिट्ठा नहीं खोलेंगे, तो फिर खोलेगा कौन?
सच हम नहीं बोलेंगे, तो फिर बोलेगा कौन?
✍️ गिरगिट की तरह रंग बदलना, ऐसा मेरा धर्म नहीं।
झूठ को भी सच कह देना, ऐसा मेरा कर्म नहीं।
ज़ुल्म पर ज़ुबां नहीं खोलेंगे, तो फिर खोलेगा कौन?
सच हम नहीं बोलेंगे, तो फिर बोलेगा कौन?
✍️ ईमान-धर्म पर आँच आ जाए, रिश्वत पर नहीं डोलूंगा।
कोई गर्दन पर तलवार रख दे, तब भी मैं सच ही बोलूंगा।
न्याय के तराज़ू नहीं तोलेंगे, तो फिर तोलेगा कौन?
सच हम नहीं बोलेंगे, तो फिर बोलेगा कौन?
✍️ कभी कुरुक्षेत्र में गीता का, उपदेश सुनना होता है।
कभी बाँसुरी वाले हाथों में भी, चक्र-सुदर्शन होता है।
कड़वाहट में मिठास नहीं घोलेंगे, तो फिर घोलेगा कौन?
सच हम नहीं बोलेंगे, तो फिर बोलेगा कौन?
✍️ रंजन शर्मा "पक्का बिहारी"
📚 Description
कवि मुंह नहीं खोलेगा, तो फिर खोलेगा कौन? रंजन शर्मा "पक्का बिहारी" की एक ओजस्वी एवं सामाजिक चेतना से प्रेरित कविता है। यह रचना सत्य, न्याय, ईमानदारी और निर्भीक अभिव्यक्ति की आवाज़ बुलंद करती है। कविता समाज को अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सच बोलने की प्रेरणा देती है तथा साहित्य के दायित्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।
✍️ रचनाकार: रंजन शर्मा "पक्का बिहारी"
📍 शहर: संग्रामपुर, मुंगेर
🏛️ राज्य: बिहार
📖 प्रदर्शित : Event.MirchiPlus
Keywords: कवि मुंह नहीं खोलेगा, रंजन शर्मा, पक्का बिहारी, ओज कविता, सत्य, न्याय, वीर रस, सामाजिक कविता, हिंदी कविता, Event.MirchiPlus
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