पुरानी यादें (बदलता समाज) | Bavita Verma | Event.MirchiPlus
पुरानी यादें (बदलता समाज)
हम जी रहे हैं इक्कीसवीं सदी में
दुनिया हर पल बदल रही है,
रिश्तों की उन पुरानी यादों से
नई पीढ़ी दूर निकल रही है।
वो दादी-नानी की मीठी कहानियाँ
अब सुनने को नहीं मिलती हैं,
पुराने बागों की महकती कलियाँ
अब पहले जैसी नहीं खिलती हैं।
गाँव की गलियों की वो रौनक
अब आँखों से ओझल हो गई,
पेड़ों की ठंडी छाँव छोड़कर
ज़िंदगी शहरों में खो गई।
कुएँ का मीठा पानी अब
पीने को नहीं मिलता है,
पानी तो छोड़ो अब गाँवों में
कुआँ भी नहीं दिखता है।
हमारे पूर्वज बैलों से
खेतों को जोता करते थे,
ना कोई gym, ना साधन फिर भी
हमसे ज्यादा बलवान रहते थे।
एक वक़्त की रोटी के लिए
माँ चक्की में गेहूँ पीसती थी,
बच्चों को शुद्ध भोजन देकर
खेतों में भी काम करती थी।
बच्चों की हँसी से पूरा
गाँव चहका करता था,
हर आँगन में खुशियों का
सावन बरसा करता था।
आज के बच्चे घर से
बाहर नहीं निकालते हैं,
मोबाइल में खो जाते हैं
अब मस्ती में झूमा नहीं करते हैं।
इन बदलते हुए वक़्त में
समाज बहुत बदल गया है,
इंसान अपनों से जलकर
हर रिश्ते से दूर हो गया है।
रिश्तों में अब वो अपनापन
वो पहले जैसी बात नहीं,
तकनीक की चमक में खोए लोग
दिलों में अब जज़्बात नहीं।
हर कोई अपने कामों में
इतना ज्यादा व्यस्त हो गया है,
गाँव की प्यारी यादों से
बहुत दूर हो गया है।
अब ना किसी को गाँव
याद आता है ना पेड़ों की छाँव,
इस जगमगाती दुनिया में इंसान
धरती पर रखना भूल गया पाँव।
पुराने रिश्ते, पुरानी बातें,
अब बस यादों में रह गई हैं,
वो सादगी और अपनापन
जाने कहाँ खो गई हैं।
Bavita Verma
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