शहर और लड़के — दिशांत की भावनात्मक कविता

शहर और लड़के रचनाकार: दिशांत स्थान: बलिया, उत्तर प्रदेश जब लड़के असीम वेदनाओं को बदन से लपेट कर घर लौटते हैं, और एक हल्की मुस्कान से अपनी सारी थकान को छुपाते हैं। नहीं बताते शहर में वो उस बंद कमरे की हालत, वो सिर्फ चुपचाप सुनते हैं यहाँ सबकी बातें। बस उम्मीद उन्हें हौसलों की है, उन्हें बचाए रखनी है अपनी सकारात्मकता; सवालों से स्वयं को बचाने लगे हैं वो, जो कभी जवाब देने में मुखर हुआ करते थे। कुछ समय बाद फिर उसी पुराने कमरे में लौट आते हैं; शहर की इस भीड़ में अपना अस्तित्व ढूंढने निकले, इन लड़कों की अहमियत को अक्सर बेरोजगारी से नाप दिया जाता है। अंततः... घर वहीं लड़के लौट पाए जो सफल हुए, बाकियों ने तो केवल शहर और कमरा बदला! — दिशांत कवि परिचय दिशांत बलिया, उत्तर प्रदेश


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