तुझ बिन निकले प्राण हो । मुकेश कुमार नवगछिया भागलपुर



तुझ बिन निकले प्राण हो....

तुम कहती हो, क्या लगती हूँ,
जब कहती हो, क्या लगती हूँ,
मैं कहता मेरी जान हो,
तुम कहती हो -
जब कहती -

मैं कान्हा तू मेरी राधा,
तुम बिन तो मैं अब तक आधा,
जीवन का संयोग ना जाना - 2
तुझ बिन निकले प्राण हो,
तुम कहती हो --

पढ़ने को जब पुस्तक खोलू,
याद किया सबकुछ मैं भूलूँ,
कलम किताबै छूटी अब तो -2
मुश्किल में है प्राण हो,
तुम कहती हो--
जब कहती हो--

जी नहीं लगता तुम बिन अब तो,
सखियाँ बनाती बाते अब तो,
तोड़ के सारे बंधन आजा -2
जोड़ो संग मेरे नाम हो,
तुम कहती हो--
जब कहती हो--

✍️ कवि: मुकेश

🌿 अखिल भारतीय ग्रामीण साहित्य मंच 🌿


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